Monday, April 9, 2012

मेरा क्या कसूर ?


सुना था धरती बड़ी सुन्दर है
स्वर्ग का सुख इसके अन्दर है
कहा मैंने खुदा से मुझे भी जन्नत दिखा दे
किसी के यहाँ मुझे भी बेटा या बेटी बना दे
बेटी बनकर में किसी बगिया को खिला दुगी
एक जान होकर भी दो घरो को महका दुगी
क्या पता था की सपने मेरे चुरचुर हो जायेगे
दुनिया में आने से पहले दुश्मन मेरे हो जायेगे
अभी तक तो मैने इस दुनिया को न जाना था
अपने और पराये को अभी तक न पहचाना था
सब कह रहे है मुझको यह बेटी तो नासूर है
तुही बता ऊपर वाले इसमें मेरा क्या कसूर है
माँ के कारन ही तो यह दुनिया सारी आई है
फिर भी ओरत की दुनिया में न चल पाई है
माँ बचा ले मुझको तेरे दुःख में काम आउगी
दर्द की हर घडी मै तेरी साथी मै बन जाऊगी
माँ मनाके बाबुल को इस दुनिया मै बुला ले तू
इस प्यारी प्यारी दुनिया को मुझे भी दिखा दे तू
माँ कह रही है बेटी से बेटी मन मेरा मजबूर है
तुही बता ऊपर वाले इसमें मेरा क्या कसूर है
सोचेते सब अगर ऐसा तो तू कहा से आती माँ
बिन ओरत के यह दुनिया कहा से बन पति माँ
बाबुल मेरे मै तो रुखी सुखी से काम चला लूगी
आंखो से आंसू पुछुगी दुःख में साथ सदा दुगी
आई नहीं दुनिया में फिर ऐसा क्या अपराध किया
फिर क्यों बाबुल तुने मुझको गर्भ में ही मार दिया
बाप कहे बेटी से बेटी यह दुनिया का दस्तूर है .
तुही बता ऊपर वाले इसमें मेरा क्या कसूर है
तुही बता ऊपर वाले इसमें मेरा क्या कसूर है

Friday, April 6, 2012

क्या ये जमीं, क्या वो फलक

क्या ये जमीं, क्या वो फलक,
वही है अँधेरा, वही है चमक,
रात की दुल्हन जाग रही है,
दिल सड़कों का रहा है धड़क,

चलते चलते हाथ मिलाकर,
गुजर जाना दो बोल कहकर,
सीख लिए इस शहर में आकर,
हमने भी कुछ यारी के सबक,

सेहरा सेहरा ढूंढ भी ले,
खुद को भूला रही मगर,
चेहरों के इस जंगल में तो,
अक्सर दिल जाते हैं भटक,

तनहा तनहा यूँ हर कोई,
सुबा से लेकर शाम चले,
सूरज ने कब खोली पलकें,
याद कहाँ अब बीती शफक,

ऐसी कोई कविता

क़ाश... मैं ऐसी कोई कविता लिख पाता,
कि पढ़ने वाला पेट की भूख़ भूल जाता,
और प्यासे मन की दाह को तृप्त कर पाता,
क़ाश... मैं ऐसी कोई कविता लिख पाता,
कि पढ़ने वाला अपनी थकन को खूंटी पर उतार टांगता,
और पसीने से लथ-पथ बदन को हवाओं में लिपटा पाता,
क़ाश... मैं ऐसी कोई कविता लिख पाता,
कि पढ़ने वाला देख पाता अपना अक्स उसमें,
और टूटे ख्वाबों की किरचों को फ़िर से जोड़ पाता,
क़ाश... मैं ऐसी कोई कविता लिख पाता,
कि पढ़ने वाला रुई की मानिंद हल्का हो जाता,
पंछियों सा उड़ता, और मछलियों सा तैर पाता,
क़ाश... मैं ऐसी कोई कविता लिख पाता,
जिसका हर्फ़ हर्फ़ आँखों में आंसू की तरह उतर आता,
परदे़स में आयी, वतन की याद सा बिखर जाता....
....सुबह जब देखी,
रात भर की जगी...
थकी... उदास...
...ऑंखें तुम्हारी मैंने,
बस यही सोचा -
क़ाश... मैं ऐसी कोई कविता लिख पाता.....

सिगरेट


दोस्तों, यूं तो यह एक व्यक्तिगत कविता है, पर आप लोगों के साथ बाँट रहा हूँ, ताकि अपने इस फैसले पर मजबूती से खड़ा रह सकूं....
*
*
*
तलब से बेकल लबों पर,
मैं रखता था - सिगरेट,
और सुलगा लेता था चिंगारी,
खींचता था जब दम अंदर,
तो तिलमिला उठते थे फेफडे,
और फुंकता था कलेजा,
मगर जब धकेलता था बाहर,
निकोटिन का धुवाँ,
तो ढीली पड़ जाती थी,
जेहन की उलझी, कसी नसें, कुछ पल को,
धुवें के छल्ले जैसे,
कुछ दर्द भी बाँध ले जाते थे, साथ अपने,
हर कश के साथ मैं पीता था आग, और जला देता था,
जिंदगी के दूसरे सिरे से कुछ पल,
और निकाल लेता था अपना बदला - जिंदगी से,
एश ट्रे में मसलता था सिगरेट के "बट" को ऐसे,
जैसे किसी गम का सर कुचलता था,
अजीब सा सकून मिलता था .

मगर उस दिन जब...

एश ट्रे से उठते धुवें को
ध्यान से देख रही थी - गुड़िया मेरी,
उसकी हैरान आँखों में, घूम गया था समय जैसे -
...कॉलेज.... दफ्तर.... यार दोस्त...खोखे वाले...कॉफी होम...
...और उँगलियों के बीच दबी सिगरेट....
...भरी हुई एश ट्रे.... खांसता पिता...
...अस्पताल... ऑपरेशन थिएटर .... मैं ही तो हूँ अन्दर...
...और बिटिया बाहर... चिंतित .... परेशान...
मेरी गुड़िया.... कितनी मासूम और प्यारी है...
है ये भी तो एक सुख, जो जिम्मेदारी है,
जिंदगी....
इतनी बुरी भी नही है शायद ...
फैंक आया हूँ यही सोच कर अब -
भरी हुई एश ट्रे, डस्ट बिन में,
शुक्रिया सिगरेट, तेरह सालों के साथ का,
पर अब समय है विदा कहने का,
धुवें के लंबे कश अब और नही,
अलविदा.... सिगरेट ....अलविदा...

मां को कैसा लगता होगा?

मां को कैसा लगता होगा?
जन्मा होगा जब कोई फूल
सारे दुःख भूली होगी
देख अपने लाल का मुंह ।

मां को कैसा लगता होगा?
बढ़ते हुए बच्चों को देख
हर सपने पूरी करने को
होगी तत्पर मिट जाने को।

मां को कैसा लगता होगा?
बच्चे हुए होंगे जब बड़े
और सफल हो जीवन में
नाम कमाएं होंगे ख़ूब ।

मां को कैसा लगता होगा?
बच्चे समझ कर उनको बोझ
गिनने लगे निवाले रोज़
देते होंगे ताने रोज़।

मां को कैसा लगता होगा?
करके याद बातें पुरानी
देने को सारे सुख उनको
पहनी फटा और पी पानी।

मां को कैसा लगता होगा?
होगी जब जाने की बारी
चाहा होगा पी ले थोड़ा
बच्चों के हाथों से पानी।

मां को कैसा लगता होगा?
जा बसने में बच्चों से दूर
टकटकी बांधें देखती होगी
उसी प्यार से भरपूर।

मां को कैसा लगता होगा?
मां को कैसा लगता होगा?

’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो

माँ को गले लगाते हो, कुछ पल मेरे भी पास रहो !
’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो !
मैनेँ भी मन मे जज़्बातोँ के तूफान समेटे हैँ,
ज़ाहिर नही किया, न सोचो पापा के दिल मेँ प्यार न हो!

थी मेरी ये ज़िम्मेदारी घर मे कोई मायूस न हो,
मैँ सारी तकलीफेँ झेलूँ और तुम सब महफूज़ रहो,
सारी खुशियाँ तुम्हेँ दे सकूँ, इस कोशिश मे लगा रहा,
मेरे बचपन मेँ थी जो कमियाँ, वो तुमको महसूस न हो!

हैँ समाज का नियम भी ऐसा पिता सदा गम्भीर रहे,
मन मे भाव छुपे हो लाखोँ, आँखो से न नीर बहे!
करे बात भी रुखी-सूखी, बोले बस बोल हिदायत के,
दिल मे प्यार है माँ जैसा ही, किंतु अलग तस्वीर रहे!

भूली नही मुझे हैँ अब तक, तुतलाती मीठी बोली,
पल-पल बढते हर पल मे, जो यादोँ की मिश्री घोली,
कन्धोँ पे वो बैठ के जलता रावण देख के खुश होना,
होली और दीवाली पर तुम बच्चोँ की अल्हड टोली!

माँ से हाथ-खर्च मांगना, मुझको देख सहम जाना,
और जो डाँटू ज़रा कभी, तो भाव नयन मे थम जाना,
बढते कदम लडकपन को कुछ मेरे मन की आशंका,
पर विश्वास तुम्हारा देख मन का दूर वहम जाना!

कॉलेज के अंतिम उत्सव मेँ मेरा शामिल न हो पाना,
ट्रेन हुई आँखो से ओझल, पर हाथ देर तक फहराना,
दूर गये तुम अब, तो इन यादोँ से दिल बहलाता हूँ,
तारीखेँ ही देखता हूँ बस, कब होगा अब घर आना!

अब के जब तुम घर आओगे, प्यार मेरा दिखलाऊंगा,
माँ की तरह ही ममतामयी हूँ, तुमको ये बतलाऊंगा,
आकर फिर तुम चले गये, बस बात वही दो-चार हुई,
पिता का पद कुछ ऐसा ही हैँ फिर खुद को समझाऊंगा!

एक छत के नीचे...

उनके शहर में फ़िर सुबा हुई,
शहर के मुर्गे की बांक -
अलार्म घड़ी का,
साहब को आखिर उठा कर ही माना,
थके मांदे थे कल रात के,
फ़िर भी उठे, जैसे किसी
जुर्म का भार हो सर पर,
नल की टूटी खोली और,
वाश बेसन में ही धो डाला -
रात का चेहरा
मेम साहब भी उठी,
और खिड़की के परदे हटा कर,
बाहर झाँकने लगी,
सामने वाली बिल्डिंग के पीछे से कहीं,
उजाला फूट रहा था,
सड़क पर चहल-पहल लग गयी थी,
गाड़ियों के शोर में भी सुनाई आ रहा था,
हल्का हल्का कलरव,चिडियों का,
नौकर चाय ले आया था,
और साथ में अखबार भी,
साहब ने अखबार उठाकर,
पलटना शुरू किया,
बिसनेस न्यूज़ पर आकर रुके,
शेयर्स के भाव....
औधोयोगिक क्रांति से बहुत खुश थे साहब,
तभी उनको ख्याल आया मीटिंग का,
घड़ी देखी तो बौखला गए,
सिगरेट जला ली और
फटाफट तैयार होने लगे.
वहीं मेम साब बड़ी तसल्ली से
अपने दिन की योजनाओं पर नज़र डाल रही थी -
शोप्पिंग.....डेंटिस्ट से मुलाकात...
सोशल वर्क के लिए जमुना स्लम बस्ती में जाना...
और फ़िर शाम को रेखा के घर फैंसी ड्रेस पार्टी... और डिनर..
लक्की रेखा, इकलौता बेटा अमेरिका जो जा रहा है...

दादा जी ने रोहन कों
ख़ुद तैयार किया था, स्कूल के लिए,
सारे रस्ते रोहन बोलता रहा,
दादाजी हँसते रहे,
स्कूल के गेट पर,
दादाजी ने रोहन कों
उसका बैग थमा दिया,
दादाजी कों एक प्यारी सी "किस्सी" देकर,
रोहन अपने क्लास की तरफ़ दौड़ गया,
दादाजी उसे देखते रहे,
अपनी आँखों से ओझिल होने तक,
और फ़िर.....

लौट आए अपने खाली मकान में,

बेटा-बहु कह गए थे फ़िर -
" आज रात देर से लौटेंगे "

जिन्दगी



दर्द की एक दास्ताँ है जिन्दगी,
मौत का ही तो आइना है जिन्दगी ।

सच की पथरीली जमी पर,
झूठ का एक आसमा है जिन्दगी ।

दोस्तो से अजनबी और,
दुश्मनों से आशना है जिन्दगी ।

वक़्त बहता पानी है और,
बूँद का एक बुलबुला है जिन्दगी ।

हर कदम अंधा सफ़र है,
हादसों का सिलसिला है जिन्दगी ।

आदत सी हो गयी है

हादसों की तो अब जैसे, आदत सी हो गयी है,
रोज कुछ बुरा सुनने की, रवायत सी हो गयी है,

कॉफी टेबलों पर मुद्दों का अकाल है जो अमन है,
कोई सनसनी नहीं जेहन में, आफत सी गयी है,

तंत्र मन्त्र चमत्कारों से, पका रहा था मीडिया,
दो चार बम फटे शहर में, राहत सी हो गयी है,

रटे रटाए शब्द फिर वही आ रहे आलाकमानों से,
कड़े शब्दों में निंदा कर दी, रहमत सी हो गयी है,

हमदर्दी का अभिनय करते, घूम रहे हैं चैनल वाले,
ब्रेकिंग न्यूज़ है आज धमाका, बरकत सी गयी है,

कुंठाएँ इतनी कि शराब शबाब सब हुए हैं बेअसर,
रस वीभत्स दिखे हर तरफ, नीयत सी हो गयी है,

आम लोग महफूज़ नहीं, सड़कों घरों बाजारों में भी,
हिफाज़त कैदखानों सरीखी, लज्जत सी हो गयी है,

उफ्फ ये किस बेदिली के दौर में जी रहा है "सजीव",
दिल फटता नहीं किसी दर्द से, आदत सी हो गयी है,