Friday, April 6, 2012

क्या ये जमीं, क्या वो फलक

क्या ये जमीं, क्या वो फलक,
वही है अँधेरा, वही है चमक,
रात की दुल्हन जाग रही है,
दिल सड़कों का रहा है धड़क,

चलते चलते हाथ मिलाकर,
गुजर जाना दो बोल कहकर,
सीख लिए इस शहर में आकर,
हमने भी कुछ यारी के सबक,

सेहरा सेहरा ढूंढ भी ले,
खुद को भूला रही मगर,
चेहरों के इस जंगल में तो,
अक्सर दिल जाते हैं भटक,

तनहा तनहा यूँ हर कोई,
सुबा से लेकर शाम चले,
सूरज ने कब खोली पलकें,
याद कहाँ अब बीती शफक,

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