Tuesday, July 22, 2014

रातो को तन्हाई

रातो को तन्हाई में, अक्सर सोचा करते हैं क्या खास है पाया तुम में, तुम पर क्यों हम मरते हैं? सवाल ये हमने किया खुद से जब, एक बार न सों बार किया जवाब कभी न आया जुदा सा, हर बार एक इज़हार किया तुम को पाकर हम हुए धनवान, तुमको खो कर हुए गरीब कोशिश बहुत की हमने, पर बदल न पाए अपने नसीब फिर भी दिल में एक आस है, तेरे पास होने का एहसास है दूर तू नजरो से हो मगर, दिल के हर दम पास है आजा अब लौट के आजा, तेरे बिना मन उदास है जल्दी आजा, दौड़ के आजा, ना जाने कब तक इन साँसों में सांस है

( निरंजन कुमार पटेल )

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (23-07-2014) को "सहने लायक ही दूरी दे" {चर्चामंच - 1683} पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. धन्यवाद शास्त्री जी
      जो आपने अपना कीमती समय निकालकर मेरे ब्लॉग को पढ़ा इस पर आपका बहुत बहुत धन्यवाद
      आप लोगों के आशीर्वाद और प्यार भरे स्नेह के साथ मैं आपलोगों को सेवा देते रहूँगा
      (निरंजन कुमार पटेल )

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  2. Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद

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  3. धन्यवाद
    जो आपने अपना कीमती समय निकालकर मेरे ब्लॉग को पढ़ा इस पर आपका बहुत बहुत धन्यवाद
    आप लोगों के आशीर्वाद और प्यार भरे स्नेह के साथ मैं आपलोगों को सेवा देते रहूँगा
    (निरंजन कुमार पटेल )

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